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10 नवंबर 2015

आयुर्वेदिक खान-पान टिप्‍स से पाचन क्रिया (Digestive System) को करें दुरुस्‍त

आयुर्वेदिक खान-पान  टिप्‍स से पाचन क्रिया (Digestive System) को करें दुरुस्‍त 

Upcharwala [Home remedies in Hindi]


Digestive System
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आपके अच्छा स्वास्थ्य अच्छे पाचन तंत्र (Digestive System) की देन होता है। हम जो कुछ भी खाते हैं, उसे सही ठीक से जिश्म  में पहुंचाने का कार्य  हमारा पाचन तंत्र (Digestive System) ही करता है। पाचन तंत्र (Digestive System) खाने को एनर्जी के रूप में बदल कर जिश्म  को पोषण और ताकत प्रदान करता है और हमारी रोग प्रतिरोधक शक्ति को मजबूत बनाता है। पाचन तंत्र (Digestive System) में गड़बड़ी होने से हम जो कुछ भी खाते हैं, उसे सही से पचा नहीं पाते। इसके वजह से  जिश्म  को आवश्यक विटामिन और मिनरल नहीं मिल पाते और जिश्म में हानिकारक तत्व लगातार बढ़ने लगते हैं। और हमारा इम्यून सिस्टम भी धीरे-धीरे काम करना बंद कर देता है इसके वजह से कई बीमारी हमपे हमला कर देता है । कभी कभी  हम स्‍वाद-स्‍वाद में बहुत ज्‍यादा खा लेते हैं। उस समय तो हमें पता ही नहीं चलता, लेकिन बाद में पछताना पड़ता है। जब हमारा पेट इस खाने को सही हजम नहीं कर पाता तो हमें अपच, एसिडिटी, कब्ज जैसी पेट से जुड़ी हर समस्याओं से गुजरना पड़ता है।

पाचन तंत्र (Digestive System) को दुरुस्‍त रखें आयुर्वेंद

पाचन तंत्र (Digestive System) अपनी तय की गई समय सीमा के अनुसार चलती है और इस समय सीमा के वजह से  हमें दिन के अलग-अलग पहर में भूख लगती है। कुछ भी खाने के बाद हमारा पचान तंत्र अपना काम करना शुरू करता है तथा जैसे ही उनका काम खत्म होता है वह अगली क्रिया प्रारंभ करने के लिए मस्तिष्क को संकेत करता है। अगर इस प्रक्रिया में बाधा उत्‍पन्‍न हो जाये तो इससे पाचन क्रिया में बाधा उत्‍पन्‍न होने लगती हैं। लेकिन आप घबराइए नहीं क्‍योंकि आयुर्वेदिक चिकित्‍सा से आप अपनी पाचनक्रिया को तीन दिन में फिर असानी से दुरुस्‍त कर सकते हैं। आयुर्वेदिक खान-पान  टिप्‍स हमारे पाचन तंत्र (Digestive System) को सही करके उसे पहले की ही तरह कार्यशील बना देती है।

 पहला दिन

पाचन तंत्र (Digestive System) को बेहतर  करने के लिए आप पहले दिन अपने दिन की शुरुआत नाश्‍ते से करें, और सुबह उठने के थोड़ी देर बाद कम से कम दो गिलास पानी जरूर पिए । और उठने के 1 से 2 घंटे के बाद नाश्‍ता अवश्य कर लें। फिर दोपहर में खाना खायें। लेकिन एक बात का ध्‍यान रहें कि खाने में चटपटी चीजों को बिलकुल शामिल न करें। और रात का खाना सोने से 2 घंटे पहले खा लेना चाहिए। और रात के खाने के लगभग आधे घंटे के बाद 2 गिलास गुनगुना पानी का सेवन करें । पहले दिन आपका सुबह का नाश्‍ता और दोपहर का खाना सामान्‍य ज़रूर होना चाहिए और रात को जरूरत के हिसाब से खायें, यानी रात का खाना ज्यादा भरी नहीं होना चाहिए।

दूसरा दिन

दूसरे दिन पाचनक्रिया को फिर से उसी तरह  करने के लिए आपको इसकी गति को धीमा करना होगा। इसलिए दूसरे दिन आप खाना कम और लिक्विट चीजें ज्‍यादा लेने की कोशिस करें । इसके लिए आप पूरे दिन में 3 से 4 गिलास जूस लें और हल्‍का खाना जैसे दलिया  और खिचड़ी ही लें। पानी और नींबू पानी का जयादा परयोग  करें, क्‍योंकि यह पाचन क्रिया को दुरुस्‍त रखने में काफी मदद करती है। इस दौरान अपना मन शांत रखें और साथ ही हर रोज सुबह-शाम वॉकिंग भी करें।

 तीसरा दिन

आयुर्वेदिक खान-पान  टिप्‍स के आखिरी  दिन में आपको अपनी पाचनक्रिया को सामान्य कार्यशीलता पर वापस लाना  होता है। इसलिए उठने के 1-2 घंटे के बाद नाश्ता कर लें क्‍योंकि उठने के बाद ज्‍यादा देर खाली पेट रहने से भी पाचन क्रिया को नुकसान हो सकता है। और फिर दोपहर का खाना खाएं। दोपहर के खाना खाने के बाद सीधे रात का खाना खाएं। नाश्ते से लेकर दोपहर के खाने तक व दोपहर के खाने से लेकर रात के खाने  के बीच कुछ ना खाएं सिर्फ पानी पी सकते हैं । डिनर को सोने से 2 घंटे पहले खा लें। और ध्‍यान रहें डिनर की मात्रा दोपहर के खाने से थोड़ा कम ज़रूर होनी चाहिए।
इसी तरह  तीन दिन करने से आपकी पाचनक्रिया अपनी सामान्य गति पर पहुंच जाती है। यह क्रिया आपको अपनेआप  भूख का अहसास करायेगी। आयुर्वेद के नियम के अनुसार सुबह उठने के 1 या 2 घंटे के बाद नाश्ता करना, समय पर दोपहर का भोजन खाना व सोने से दो घंटे पहले रात का भोजन खाना। ये सारे आयुर्वेदिक खान-पान  टिप्‍स आपके पाचन को हमेशा दुरुस्‍त रखने में मदद करते हैं। इस खान-पान  टिप्‍स को पाचन क्रिया के खराब होने पर आप जरूर अपना सकते हैं।


मेरे इस पोस्ट को पढने के लिए शुक्रिया

09 नवंबर 2015

भूख बढ़ने का घरेलू उपचार कैसे करें ?

भूख न लगना या कम लगना (Bhookh Na Lagna)

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अरुचि,  इस रोग मे मरीज को भूख बहुत कम लगती है| अगर मरीज जबरदस्ती खाना खा भी ले तो वह अरुचिकर लगता है | रोगी 1 या 2 निवाला से ज्यादा नहीं खा पाता और उसे बिना कुछ खाये -पिये खट्टी कट्टी डकारें आनी  शुरी हो जाती  हैं | इस तरह भूक न लगने अरुचि कहलती  हैं |
आमाशय या पाचनतंत्र में कमी होने के वजह से  भूख लगनी धीरे धिर्रे कम हो जाती है | ऐसे में अगर आप कुछ दिनों तक इस बात पर ध्यान न दिया तो आपको भूख लगनी बिलकुल ही बंद हो जाती है| इसका कारण है अधिक चिंता, गुस्सा , भय और घबराहट के कारण भी यकृत की ख़राबी के वजह से  भी भूख नहीं लगती है |

घरेलु औषधियों द्वारा अरुचि का उपचार

(Bhookh Na Lagna)

१-गेंहू के चोकर में सेंधा नमक और अजवायन को एक साथ मिलाकर रोटी बनाकर खाने से भूख बढती है |
२-एक सेब या सेब के रस को रोजाना सेवन करने से खून साफ़ होता है और भूख भी खूब लगती है |
३-एक गिलास पानी में 2 ग्राम जीरा , कालीमिर्च , पुदीना , हींग और कला नमक डालकर रोज पीने से अरुचि दूर होती है |
४-अजवायन में आपने स्वाद के अनुसार कालानमक मिलाकर गर्म पानी के साथ रोज उपयोग  करने से अरुचि दूर होती है |
५-हर जोज मेथी में छौंकी गई दाल या सब्ज़ी के सेवन से भूख खूब लगती है |

६-नींबू को काटकर और इसमें कला नमक डालकर भोजन से पहले चूसने से कब्ज़ दूर होकर पाचनक्रिया तेज़ हो जाती है जिससे की आपको भूख तेजी से लगने लगती है |

05 नवंबर 2015

गर्भावस्था में महिलाएं कैसे रखे अपना खास ख्याल?


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हर महिला कि यह चाहत होती है कि वह एक तंदरुस्त बच्चे को जन्म दे। इस चाहत को पूर्ण करने के लिए गर्भावस्था (Pregnancy) मे पौष्टिक आहार को खाना बहुत जरुरी है। गर्भस्थ शिशु का सम्पूर्ण विकास भी माता के खान-पान पर निर्भर होता है। गर्भवती महिला को ऐसा पोष्टिक आहार लेना चाहिए जो उसके गर्भस्थ शिशु के पोषण में सहायक हो सके।
सामान्यत: महिला को हर रोज 21 सौ कैलोरी  अपने आहार में लेनी चाहिए। और एक गर्भवती महिला को आहार के माधयम से 3 सौ कैलोरी  अतिरिक्त  लेनी ही चाहिए। इसीलिए एक गर्भवती महिला को 24 सौ कैलोरी अपने भोजन से प्राप्त करनी चाहिए|
गर्भावस्था(Pregnancy) में महिला को आहार में कौन से चीजे लेना चहिए ओर कितनी मात्रा में लेना चाहिए इसकि अधिक जानकारी नीचे दी जा रही हैं|

1) प्रोटीन (Proteins)

गर्भवती महिला को आहार मे प्रतिदिन 50 से 75 ग्राम तक प्रोटीन की मात्रा अपने भोजन में शामिल करनी चाहिए।
गर्भवती महिला के गर्भाशय, स्तनों तथा गर्भ के पूर्ण विकास और पूर्ण वृद्धि के लिये प्रोटीन  एक बहुत ही जरूरी तत्व है।
और गर्भ धारण के अंतिम छ: माह के दौरान तो महिला को एक किलोग्राम प्रोटीन आहार  की आवश्यकता होती है।
जिन भोजन में प्रोटीन की अधिकता पाई गयी हैं वे आहार हैं दूध और दुध से बने सभी खाद्य पदार्थ , मूंगफली, पनीर, चिज़, काजू, बदाम जैसे सूखे मेवे और  दलहन, मांस, मछली तथा अंडे आदि।    


2) कैल्शियम (Calcium)

गर्भवती महिला को आहार मे हर रोज 15 से दो हज़ार मिलीग्राम तक कैल्शियम भी मिलना चाहिए।
गर्भवती महिला के और गर्भस्थ बच्चे की स्वस्थ और शक्तिशाली हड्डियों के लिये कैल्शियम की  आवश्यकता अधिक रहती है।
कैल्शियम से पूर्ण आहार में दूध और दूध से बने खाद्य पदार्थ , दलहन, मक्खन, चीज, मेथी, बीट, अंजीर, अंगूर, तरबूज, तिल, उड़द, बाजऱा, मांस आदि शामिल है।

3) फोलिक एसिड (Folic Acid)


पहली तीन महीने वाली महिलाओं को प्रतिदिन पांच ग्राम फोलिक एसिड लेंने की जरूरत होती है। दूसरी और अंतिम तीन महीनो में छ: ग्राम तक फोलिक एसिड लेंने की आवश्यकता होती है।
पर्याप्त मात्रा में Folic Acid लेने से जन्मदोष और गर्भपात होने की सम्भावना बहुत कम हो जाती है। इस तत्व के सेवन करने से गर्भवती महिला को उलटी नहीं होती हैं ।
आपको तो फोलिक एसिड  का सेवन शुरुआत में ही करना चाहिए जबसे  आपने  माँ बनने का निश्चय  कर लिया हो।
फोलिक एसिड से  युक्त आहार मे दाल, राजमा, पालक, मटर, मक्का, हरी सरसो, भिंड़ी, सोयाबीन, काबुली चना, स्ट्रॉबेरी, केला, अनानास , संतरा, दलीया, साबुत अनाज का आटा, आटे कि ब्रेड आदि का समावेश होता है।  

4)  पानी (Water)


गर्भवती स्त्री हो या कोई भी इन्सान , पानी हमारे शरीर के लिये बहुत ही महत्वपुर्ण है। गर्भवती महिलाओ को अपने शरीर में पानी कि बढ़ती हुईं आवश्यकताओं को पुरा करने के लिये प्रतिदिन कम से कम 4 लीटर (10 से 12 ग्लास) पानी अवश्य पीना चाहिए। गर्मी के मौसम में 6 लीटर पानी पीना चाहिए। 
इस बात का ध्यान रहे की हमेशा आप साफ़ और सुरक्षीत पानी ही पिएँ | अगर आप बाहर जाते है तो अपना साफ़ पानी हमेशा साथ रखे या अच्छा बोतलबंद पानी का इस्तेमाल करे। 
पानी की हर बूंद आपकी गर्भावस्था(Pregnancy) को स्वस्थ और सुरक्षित बनाने मे सहायक है।

5)  विटामिन (Vitamins)


गर्भावस्था(Pregnancy) के समय Vitamins कि जरुरत बढ़ जाती है।
खान पान ऐसा होना चाहिए कि जो पर्याप्त मात्रा मे calories तथा अधिक  मात्रा में Proteins के साथ Vitamins कि जरुरत कि पूर्ति कर सके।
हरी पत्तेदार ब्जियां, दलहन, दूध आदि से भी Vitamin उपलब्ध हो जाते है।

6) आयोडीन (Iodine)


गर्भवती महिलाओ  के लिये हर रोज  कम से कम 200 माइक्रोग्राम Iodine कि जरूरत  होती है।
Iodine आपके बच्चे के दिमाग के विकास  के लिये आवश्यक है। इस तत्व की कमी से बच्चे मे मानसिक बीमारी , वजन बढ़ना और महिलाओ मे गर्भपात जेसी अन्य समस्या उत्पन्न होती है।  
गर्भवती महिलाओ को अपने डॉक्टर कि सलाह से Thyroid Profile जॉंच कराना चाहिए।

 7) झींक (Zinc)


गर्भवती महिलाओ  को कम से कम  15 से 20 मिलीग्राम Zinc कि जरूरत होती है।
इस तत्व कि कमी से ज्यादा भूख नहि लगतीं, शारीरिक विकास रूक जात्ता है, त्वचा रोग होने के सम्भावना बढ़ जाते है।
पर्याप्त मात्रा में शरीर को Zinc कि पूर्ति करने के लिए ज्यादा हरी पत्तेदार सब्जिया ले सकते है।

8. COCOZHI


इन सभी को पूर्ति करने के लिए हम आपको एक ऐसी दवाई के बारें में बताने  जा रहे जो आपको उपरोक्त सभी जरूरतों को पूरा करता है इस दवाई का नाम का Cocozhi   जो की DXN company कंपनी का ये दवाई बहुत ज्यादा फायदेमंद और ये आसानी से बाज़ार में मिल जाते है


04 नवंबर 2015

मधुमेह के आधुनिक औषधि (Ayurvedic Medicine for Diabetes)

Ayurvedic Medicine for Diabetes


Diabetes

सबसे पहले आइये जानते हैं मधुमेह के लक्षण :-

1. दिन में कई बार पेशाब का आना।
2. बहुत अधिक प्यास का लगना।
3. बहुत पानी पीने के बाद भी गला और होठ सूखना।
4. खाना खाने के बाद भी बहुत अधिक भूख का लगना।
5. मितली होना और कभी-कभी उल्टी का होना।
6. हाथ-पैर में अकड़न और शरीर में झंझनाहट का होना।
7. हर समय कमजोरी और थकान महसूस होना।
8. आंखों से कम दिखाई देना|
9. त्वचा या पेशाब के रास्ते में संक्रमण का होना  ।
10. त्वचा बहुत ज्यादा रुखी होना।
11. लोगो में चिड़चिड़ाहट का होना ।
12. बार-बार सिरदर्द का होना ।
13. शरीर का ताप बहुत कम होना।
14. मांसपेशियों में दुखन का होना।
15. वजन में अचानक कमी होना।


मधुमेह रोगियों के लिए नई हर्बल उपचार


हम आपको आज एक ऐसी आयुर्वेदिक औषधि के बारे में बताने जा रहे हैं जो कि हाल ही में के द्वारा दिनांक 26/10/2015 को प्रमाणित हुई हैं| “BGR-34” यह औषधि गोली के रूप में पेश की गयी है। इस आयुर्वेदिक दवा का नाम 'बीजीआर-34' है और ये 100 गोलियों मात्र 500 रूपये की आती हैं तथा बाज़ार में आसानी से उपलब्ध हैं| इस दवा को दिन में दो बार ले सकते हैं| और इसके परिणाम मधुमेह के रोगियों में काफी अच्छे देखे गए हैं|

अन्य आयुर्वेदिक उपचार

सहजन के पत्ते एक चमत्कारी आयुर्वेदिक औषधी हैं| इसमें दूध की तुलना में तीन गुना कैलशियम और अधिक प्रोटीन पाया जाता है। मधुमेह रोग में इन पत्तों को खाने से भोजन के पाचन और रक्तचाप को नियंत्रित करने में मदद मिलती है। इसके नियमित सेवन से ही लाभ प्राप्त होता है ।
एक टमाटर, एक खीरा और एक करेला को मिलाकर मिक्सी में डालकर एक गिलास जूस निकाल लीजिए। इस जूस को हर सुबह खाली पेट पीना चाहिए| इससे मधुमेह के रोग की रोकथाम में बहुत अधिक फायदा होता है।
गेहूं के पौधों में रोगनाशक गुण होते हैं। ये कई जटिल रोगों की एक दवा हैं| गेहूं के छोटे-छोटे पौधों से रस निकालकर प्रतिदिन सेवन करने से भी मुधमेह नियंत्रण में रहता है। और धीरे-धीरे पूर्णतया ठीक हो जाता हैं|
मधुमेह के मरीजों को भूख से थोड़ा कम तथा हल्का, सुपाच्य भोजन लेना चाहिए। ऐसे में खीरे पर   नींबू निचोड़कर खाना चाहिए और भूख को इस प्रकार मिटाना चाहिए।
मधुमेह उपचार मे शलजम नमक सब्जी का भी बहुत महत्व है । शलजम की सब्जी का अधिक प्रयोग करने से भी खून में स्थित शर्करा की मात्रा कम होने लगती है। इसके अतिरिक्त मधुमेह के रोगी को तरोई की सब्जी , लौकी की सब्जी , परवल की सब्जी , पालक की सब्जी , पपीता का फल आदि का प्रयोग करना चाहिए।
छ: बेल पत्र , छ: नीम के पत्ते, छ: तुलसी के पत्ते, छ:बैगनबेलिया के हरे पत्ते, तीन साबुत काली मिर्च ताज़ी पत्तियाँ पीसकर खाली पेट, पानी के साथ रोजाना सेवन करें और इस खुराक को लेने के बाद कम से कम आधा घंटा  कुछ भी न खाएं , इसके नियमित सेवन से भी मधुमेह सामान्य हो जाता है।

हम हर रोज जो भी भोजन खाते है, इससे मिलने वाला कार्बोहाइड्रेट्स पचने के बाद ग्लूकोज में बदल जाता है, और यह खून में मिल जाता है, और इसे इन्सुलिन नाम का हार्मोन्स नियंत्रित करता है. डायबिटीज इस इंस्युलिन हार्मोन्स की कमी या बिलकुल न होने के कारण ही अधिक होता है. इससे शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है|

03 नवंबर 2015

त्वचा (Skin) रोग से कैसे बचे ? Skin disease in hindi)



त्वचा (Skin) रोग से बचने के घरेलू नुस्खें

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Skin disease in hindi

त्वचा(Skin) रोग में आपको कई तरह की परेशानियां हो सकती हैं। बारिशों और गर्मी के मौसम में इस तरह की समस्याएं ज्यादा होती हैं। ऐसे में त्वचा का रख रखाव  करना बहुत जरूरी होता है। नहीं तो त्वचा(Skin) रोग होने की संभावना अधिक होती है। आइए अब हम आपको त्वचा(Skin) रोग से बचने के कुछ घरेलू नुस्खें के बारे में जानकरी देने जा रहे हैं।

त्वचा (Skin) रोग से बचने के घरेलू उपचार –
Skin disease in hindi

गेंदा का फूल 

हम सब जानते है गेंदा गहरे पीले और नारंगी रंग का फूल होता है। यह त्‍वचा की समस्‍याओं का प्रभावशाली घरेलू नुस्खें है। यह छोटे-मोटे कट, जलने, मच्‍छर के काटने, रूखी त्‍वचा और एक्‍ने आदि के लिए शानदार घरेलू नुस्खें है। गेंदे के फूल में एंटी-बैक्‍टीरियल और एंटी-वायरल गुण होते हैं। यह सूजन को कम करने में भी मदद करता है। इसके साथ ही गेंदा का फूल  जख्‍मों को जल्‍दी भरने में मदद करता है। यह हर प्रकार की त्‍वचा के लिए लाभकारी होता है। गेंदे की पत्तियों को पानी में उबालकर उससे दिन में दो-तीन बार चेहरा धोने से एक्‍ने की समस्‍या दूर होती है।   


कैमोमाइल/ बबूने का फूल


कैमोमाइल का फूल त्‍वचा पर लगाने से जलन को तुरंत शांत करता है और साथ ही अगर इसका लगातार सेवन किया जाए तो आंतरिक शांति प्रदान करता है। इसके साथ ही यह केंद्रीय तंत्रिका प्रणाली पर सकारात्‍मक असर भी डालता है। यह एक्जिमा में भी काफी फायदेमंद होता है। इसके फूलों से बनी हर्बल टी का दिन में तीन –चार बार सेवन आपको काफी फायदा पहुंचाता सकता है। इसके साथ ही एक्जिमा और सोरायसिस जैसी बड़ी बीमारियों से उबरने में भी यह फूल काफी मदद करता है। एक साफ सूती कपड़े को कैमोमाइल टी में डुबोकर उसे त्‍वचा के सं‍क्रमित जगह पर लगाने से काफी लाभ मिलता है। इस प्रक्रिया को पंद्रह-बीस  मिनट के लिए दिन में चार से छह बार जरूर करें । कैमोमाइल कई अंडर-आई माश्‍चराइजर में भी उपयोग किया जाता  है।  इससे आँखों के डार्क सर्कल भी दूर होते हैं

कमफ्रे के फूल

इस फूल के पत्‍ते और जड़ें सदियों से त्‍वचा संबंधी बीमारी को ठीक करने में पर्योग की जाती रही हैं। यह कटने , जलना और अन्‍य कई जख्‍मों में काफी फायदेमंद होता है। इसमें मौजूद तत्‍वा त्वचा  द्वारा काफी तेजी से अवशोषित कर लेता हैं। जिससे आपके स्‍वस्‍थ कोशिकाओं का निर्माण होता है। इसमें त्‍वचा को ज्यादा आराम पहुंचाने वाले तत्‍व भी मौजूद होता है। अगर आपके  त्‍वचा पर कहीं जख्‍म हो जाए तो कमफ्रे की जड़ों का पाउडर बनाकर उसे हलके गर्म पानी में मिलाकर एक गाढ़ा पेस्‍ट बना लीजिये | इसे एक साफ सूती कपड़े पर फैला दें। अब इस कपड़े को जख्‍मों पर सुबह –शाम लगाने से चमत्‍कारी लाभ मिलता है। अगर आप इसे रात में बांधकर सो जाएं, तो सुबह तक आपको त्वचा को काफी आराम मिल जाता है। ध्यान रहे इसे कभी भी खाया नहीं जाना चाहिए, वर्ना यह आपके  लिवर को नुकसान पहुंचा सकता है। गहरे जख्‍मों पर भी इसका इस्‍तेमाल कभी नहीं करना चाहिए। इससे त्‍वचा की ऊपरी परत तो ठीक कर देता  है, लेकिन अन्दर की  कोशिकायें पूरी तरह ठीक नहीं हो पातीं। 


अलसी के बीज

क्या आप जानते है की अलसी के बीजों में ओमेगा थ्री फैटी एसिड होता है जो हमारे इम्‍यून सिस्‍टम को मजबूत बनाने में काफी मदद करता है। इसमें सूजन को कम करने वाले तत्‍व भी मौजूद होते हैं। यह स्किन डिस्‍ऑर्डर, जैसे एक्जिमा और सोरायसिस को भी बड़े आसानी से  ठीक करने में मदद गरता है। दिन में एक या दो चम्‍मच अलसी के बीजों के तेल का इस्तेमाल करना त्‍वचा के लिए काफी फायदेमंद साबित होता है। ज्यादा बेहतर रहेगा कि इसका सेवन किसी अन्‍य आहार के साथ ही किया जाए।

 अन्‍य नुस्खें

चर्म रोग में हल्दी, लाल चंदन, नीम की छाल, चिरायता, बहेडा, आंवला, हरेडा और अडूसे के पत्ते  को बराबर  मात्रा में लीजिए। इन सभी सामानों को पानी में 2 घंटे पूरी तरह से फूलने के लिए भिगो दीजिए। जब ये सारे सामान पूरी तरह से फूल जाएं तो इसको पीसकर गिला पेस्ट बना लीजिए। अब इस पेस्ट से 4  गुना अधिक मात्रा में तिल का तेल मिला लें ।
तिल के तेल से चार गुनी मात्रा में पानी को लेकर सारे सामानों को एक साफ बर्तन में मिला लीजिए। उसके बाद मिश्रण को हलके आंच पर तब तक गर्म करते रहें  जब तक की  सारा पानी भाप बनकर उड़ ना जाए। इस पेस्ट को पूरे शरीर में जहाँ कही पे खुजली हो वहां पर या फिर पूरे शरीर में लगाइए। इसके लगाते रहने से आपके त्वचा(Skin) की बीमारी  ठीक हो जाएगा।

चर्म रोग जैसे एग्जिमा, सोरियासिस, मस्सा, ल्यूकोर्डमा, स्केबीज या खुजली त्वचा(Skin) रोग के प्रकार हैं। किसी भी तरह  का त्वचा(Skin) रोग जब तक ठीक नही हो जाता है, बहुत तकलीफ होती है। जिसके कारण से आदमी मानसिक रूप से भी बीमार हो जाता है। त्वचा(Skin) रोग की समस्या होने पर आप स्किन के डॉक्टर से सलाह ले सकते हैं।

02 नवंबर 2015

सर्वायकल या गर्दन का दर्द का उपचार कैसे करें ? ( Neck Pain in Hindi)

सर्वायकल या गर्दन का दर्द को ठीक कैसे करें?

Neck Pain in Hindi

cervical pain

आज के इस भागदौड़ भरे युग में सर्वायकल स्पान्डयलोसिस के मरीजों  मे बहुत बड़ा इजाफा देखा गया हैं। पुराने समय में अस्पताल की लाइन में जहाँ एक या दो मरीजही मुश्किल से इस रोग से ग्रस्त पाए जाते थे वहीं अब काफ़ी बडी संख्या में बहुत से मरीजनजर आते है। आयु से भी अब इसका कोई लेना-देना न रहा। 15 वर्ष की आयु से शुरू होकर बढती हुयी उभ्र के लोगों मे यह समस्या सभी में आम रूप से देखी जा सकती है।

लक्षण और कारण

इस रोग के लक्षण में कोई जरूरी नहीं हैं कि सिर्फ़ गर्दन(Neck) में पीड़ा  होने पर और गर्दन(Neck) के जकड़े होने पर ही आयें। विभिन्न सर्वायकल मरीजों  मे अलग -2 तरह के लक्षण देखे जाते हैं:
गर्दन(Neck) की पीड़ा  और जकडन, गर्दन(Neck) स्थिर रहना, बहुत कम या न घूमना।
चक्कर आना, कन्धे का पीड़ा , कन्धे की जकडन और बाँह की नस का पीड़ा  ।
 ऊगलियों और हथेलियों का सुन्नपन

 गर्दन(Neck) की पीड़ा  के मुख्य कारण:

अगर आपकी दिनचर्या  अनियमित और अनियंत्रित हैं तो आप गर्दन की पीड़ा से ग्रस्त हो सकते हैं ।
टेढ़ी मेढ़ी अवस्था में लेटकर सोना, हमेशा उबड़-खाबड़ बिस्तर पर सोना, आरामदेह गद्देदार सोफ़ों पर या  कुर्सी पर देर तक बैठे रहना, सोते समय ऊँचा तकिया रखना या लेट कर टी वी देखना ।
यदि आप गलत ढंग से वाहन को चलाते हैं|
बहुत झुक कर बैठना या बैठे-बैठे पढना या लेटकर पढना।
काफी देर तक जमीन पर बैठकर सिलाई, बुनाई, व कशीदा करने वाले लोगों में।
गलत ढंग से और शारीरिक शक्ति से ज्यादा बोझा उठाने से |
कसरत न करना और हमेशा चिंता में रहते हुए जीवन को जीना।
संतुलित भोजन ग्रहण न करना, भोजन मे ‘विटामिन डी’ की कमी का होना, अधिक मात्रा मे चीनी और अधिक मात्रा में मीठाईयाँ खाना।
अगर व्यक्ति को गठिया आदि का रोग हो|
घंटों कम्पयूटर के सामने बैठकर काम करना|

रोग निवारण के लिये प्रचलित उपचार तरीके:

पीठ की पीड़ा  के लिये भी यही सावधानियाँ काम आयेगीं। इसलिये निम्म बातों का ध्यान रखें और अपना जीवन सुचारु रुप से जियें:
जब भी आप किसी कुर्सी या सोफ़े पर बैठें तो अपनी पीठ को सीधा रखने का प्रयास करें तथा घुटने नितम्बों से ऊँचे उठाकर रखें।
चलते समय शरीर को सीधी अवस्था मे रखने का प्रयास करें।
जब भी गाडी चलाये अपनी पीठ को सीधी रखें।
कोमल, फ़ोम के बिस्तर पर लेटना छोडकर लकड़ी के बने तख्त का प्रयोग करें ।
घर का काम करते समय पीठ को सीधी रखें।
अगर पीड़ा अधिक हैं तो गर्म पानी मे थोडा सा नमक डाल कर सिकाई करें। यह क्रम दिन मे कम से कम 2-4 बार तक अवश्य करें। दर्द में जल्द आराम देने मे यह बहुत लाभदायक है।

तकिये (pillow) की बनावट

तकिये को लेकर लोगों मे अलग-अलग तरह की ग़लतफ़हमियाँ हैं। सर्वायकल स्प्पान्डयलोसिस से पीडित व्यक्ति या तो तकिया लगाना ही बन्द कर देता है या फ़िर अन्य सहारे का प्रयोग करने लगता है जैसे तौलिये को मोड कर सिर के नीचे रखना। लेकिन यह सब प्रयोग अन्तः उसके लिये नुकसान ही पैदा करते हैं। सर्वायकल स्प्पान्डयलोसिस के हर मरीज मे कौलर और ट्रेक्शन की आवशयकता नही पडती , लेकिन आजकल इसका प्रयोग कई जगह बेवजह भी होता रहता है। लेकिन मरीजके रोग की वजह के अनुसार इसका महत्व भी अधिक है।
सर्दियों के मौसम में सर्वायकल स्प्पान्डयलोसिस के मरीजों  की समस्यायें बढनी शुरु हो जाती हैं, बाजार मे मिलने वाले कालर के अपेक्षा आम प्रयोग में होने वाले गर्म मफ़लर को गले मे इस तरह बाधें कि गर्दन(Neck) का घुमाव नीचे की तरफ़ अधिक न हो। देखने मे भी यह अजीब नहीं लगता और गर्दन(Neck) की माँसपेशियों को ठंड से भी पूरी तरह बचाव हो जाता हैं।

एकयूप्रेशर (Acupressure) विधि से

बहुत से डॉक्टर संभवत: एकयूप्रेशर की उपयोगिता से सहमत नहीं हैं, मगर सर्वायकल स्प्पान्डयलोसिस के कई मरीजों  मे इस पद्दति से आराम मिला हैं , भले ही यह इस दर्द के कारणों को दूर करने मे सक्षम न हो लेकिन पीड़ा के अधिक बढ़ने पर यह आपको काफ़ी जल्द ही आराम दे देती है।
सर्वायकल स्प्पान्डयलोसिस मे फ़िजयोथिरेपी की भूमिका:
सर्वायकल व्यायाम पीड़ा को बढ़ने से रोकते हैं साथ मे अकडे हुये जोडों और माँसपेशियों को भी सही करते हैं ।
अपने सिर को दाहिनी तरफ़ कन्धे तक झुका ले  , थोड़ी देर रूकें और उसके बाद पुन: सीधी कर ले। यही क्रम फिर बायें तरफ़ भी करें।
अपनी ठुड्डी (chin) को छाती की तरफ़ झुकायें, रुकें,तत्पश्चात सिर को पीछे की ओर ले जायें।
अपने सिर को बायें ओर के कान की तरफ़ मोडें, रुकें और तत्पश्चात मध्य मे लायें। यही क्रम बायें तरफ़ भी धीरे-धीरे करें।
इस व्यायाम को करते समय साँस को रोके नहीं। हर व्यायाम को पांच से छ: बार तक करें और इसके बाद शरीर को बिलकुल ढीला छोड दें।
अपने माथे को हथेलियों से दबाये और सिर को अपनी जगह से जरा भी हिलने न दें।
अपनी हथेलियों का दबाब सिर के बायें तरफ़ दे और सिर को हिलने न दें। यही क्रम दायें तरफ़ भी करें।
अपनी दोनों हथेलियों का दबाब सिर के पीछे की ओर  दें और सिर को बिलकुल स्थिर रखें।
अपनी हथेलियों का दबाब माथे पर दें और सिर को बिलकुल स्थिर रखें।
फ़िजयोथिरेपी व्यायामों को करते समय यह बात हमेशा ध्यान रहें कि अगर किसी भी समय ऐसा लगे कि पीड़ा  अधिक हो रही हैं तो व्यायाम  न करें। सर्वायकल व्यायामों को कम से कम दिन मे दो से तीन बार जरूर करें ।
एक समतल फ़र्श पर बिना तकिये के पीठ के बल आराम से लेट जाएँ| फिर अपनी गर्दन(Neck) को जितना संभव हो उतना धीरे-धीरे ऊपर की ओर उठाते जाएँ| यह ध्यान रहे कि पीठ का हिस्सा बिलकुल न उठे| गहरी से गहरी सांस भीतर की ओर खींचें| फिर उतने ही धीरे-धीरे गर्दन(Neck) नीचे की ओर करते जाएँ| सांस धीरे-धीरे छोड़ें और पूरी शक्ति से अंदर फेफड़े की हवा बाहर फेंक दे | यह व्यायाम कम से कम दस से बारह बार, सुबह-शाम करें| इस व्यायाम से आपके गर्दन(Neck) की मांसपेशियों को ताकत मिलती है तथा इसके परिणाम आपको पंद्रह दिन के भीतर मिलने लगेंगे| नियमित व्यायाम से गर्दन(Neck) की पीड़ा से पीछा छुट सकता है.

होम्योपैथी चिकित्सा (Homeopathic Treatment)

जहाँ अन्य चिकित्सा की पद्धतियाँ विशेष कर एलोपैथी चिकित्सा पद्धति सिर्फ़ पीड़ानाशक औषधियों तक ही सीमित हैं  वहीं होम्योपैथी रोग के मूलकारण और उससे उत्पन्न होनी वाली समस्यायों को दूर करने मे कारगर है। एक होम्योपैथिक चिकित्सक को सर्वायकल रोगों मे न सिर्फ़ औषधि के चयन बल्कि रोग को  करने के तरीको के बारे मे भी अच्छी तरह जानना चाहिये।
अधिक समस्यां होने पर योग्य डॉक्टर से सलाह ले|